रीवा

Rewa News : रीवा में राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव का शुभारंभ

रीवा: 10 वें राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव का शुभारम्भ हुआ

 

 

MP REWA NEWS : मध्यप्रदेश के रीवा में मण्डप सांस्कृतिक शिक्षा कला केन्द्र द्वारा तीन दिवसीय राष्ट्रीय रंग अलख नाट्योत्सव का शुभारम्भ माता सरस्वती के सम्मुख दीप प्रज्जवलित कर हुआ। पूर्वरंग में राष्ट्रीय दुलदुल घोड़ी नर्तक राजमणि तिवारी एवं साथियों की प्रस्तुति हुई। तदोपरांत आमंत्रित नाटक “असमंजस बाबू” का मंचन हुआ।

 

भारत के आम आदमी का चेहरा असमंजस बाबू है। अनिश्चय , ऊहापोह की परिस्थिति से गुजरता साधारण आदमी प्रतिदिन के जीवन में टूटता बिखरता है। सत्यजित रे की कहानी में अत्यंत सधी रचना कौशल के साथ गूथा गया है
कई बार हम लीक से हटकर अपनी राह खोजते हुए भी लीक के शिकार हो जाते हैं। तब हम पाते हैं कि हमारी जिंदगी एक बधी लीक पर ही चल रही हैं। जबकि हमने उम्र को आकर्षक विभ्रम में गुजार दिया। जब हमें भी पैसा चाहिए, मजहब के खूटे चाहिए, जाति वर्ग की बैसाखियां चाहिए तो फिर हम अन्य मनुष्यों से अलग कैसे हुए? विशिष्ट कुछ करने और न करने के बीच पसरी असमंजस को ही वस्तुतः हमें जीना और महसूस करना होता है।

Rewa News: National Rang Alakh Natyotsav inaugurated in Rewa

और हरबार चितकबरा सपना ही हमारे साथ लगता है हमारी आंखें पथरा जाती हैं नाटक का शीर्षक अपनी पूरी कहानी कह देता है। अव्यवस्था की घटाटोप परिस्थिति में प्रायः सत्य की सही-सही शिनाख्त ही नहीं हो पाती, और व्यक्ति मन की त्रासदी अरेखांकित रह जाती हैं, असमंजस बाबू का चरित्र इन्हीं विसंगतियों और विडंबनाओ के बीच से उभरता है और हमारे जीवन के लिए आईने की तरह उपलब्ध होता है जिसमें हम अपने युगसत्यों का बिम्ब अपने ही चेहरों पर देख पाते हैं।

 

 

नाटक में कुत्ता एक ताकतवर प्रतीक के रूप में आता है असमंजस बाबू और उसके बीच तादात्म्य का एक तंतु सा खिंच जाता है, एक सेतु बनता है संवाद का।असमंजस बाबू का कुत्ता हंस भी लेता है वह असमंजस बाबू के अकेलेपन को सुन्दर बना देता है नाटक के अंत में असमंजस बाबू का कुत्ता बेचने वाला प्रसंग अत्यंत मार्मिक है भूख और पैसों की जरूरत के चलते असमंजस बाबू भी आम आदमी की तरह टुकड़खोर समझौते करते हैं, चेक पर हस्ताक्षर होता देख कुत्ता तो ठठाकर कर हंस पड़ता है पर असमंजस बाबू की रूह फूट कर रो पड़ती है, आज हम सभी अपने-अपने भीतर के असमंजस बाबू को जीने के लिए विवश और अभिशप्त हैं। राकेश यादव के एकल अभिनय और अनिल रंजन भौमिक के काल्पनिक सुन्दर दृश्यों के निर्देशन से नाटक को उत्कृष्टता के आयाम तक पहुंचाया। विनोद यादव का संगीत नाटक को मजबूत बनाता रहा एवं सूजॉय घोषाल के प्रकाश ने नाटक को दर्शकों के मन मे उतार दिया। प्रस्तुति समानांतर प्रयागराज की रही। नाट्योत्सव में प्रवेश निःशुल्क है। सैकड़ों दर्शकों ने नाटक देखा और प्रेरित हुए।संस्था के संरक्षक दादा अशोक सिंह जी
डॉ0 विद्या प्रकाश तिवारी, प्रो0 दिनेश कुशवाहा, हरीश धवन, चंदिका प्रसाद द्विवेदी चंद्र, प्रोफ़ेसर सेवाराम त्रिपाठी आदि विशिष्ट अतिथि उपस्थित थे। नाट्य समारोह के उत्तरोत्तर प्रगति और श्रेष्ठता को अतिथियों ने अपने उदबोधन में रेखांकित किया।

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